Atulan Atal Ji

अतुलनीय अटल जी

प्रशंसकों ने तो श्रद्धांजलि दी ही, साथ पूरे देश को उनका जाना झकझोर गया। विदेशों में उनके प्रशंसकों को उनका जाना खल रहा है। पाकिस्तान की जनता भी उनके न रहने से स्तब्ध रह गई। सभी को लगा कि उनके बीच से एक ऐसी महान शख्सियत चली गई, जिसने भारतीय राजनीति को नये आयाम दिए। विश्व में कूटनीति की नई परिभाषा गढ़ी। अटल इरादों के विशाल ह्रद्य वाले अटलजी राजनीति में शुचिता, पवित्रता,नैतिकता, पारदर्शिता और सौहार्दता के लिए देशवासियों के मन में हमेशा छाये रहेंगे। 12 साल से मौन अटलजी के महाप्रयाण पर करोड़ों लाखों ने उन्हें विदाई दी। महाप्रयाण के अवसर पर नम हुईं करोड़ों आंखें हमें बताती हैं कि अटलजी का न रहना, एक राजनीतिक युग के समाप्त होने जैसा है। अटलजी ने चाहे 12 साल से एक शब्द नहीं बोला था, पर भारतीय जनता पार्टी के सक्रिय करोड़ों कार्यकर्ताओं के पास उनसे जुड़ा कोई न कोई संस्मरण जरूर था। गांव-देहात के कार्यकर्ता हो या प्रदेश की राजधानी के कार्यकर्ता हो या दिल्ली के। सभी अटलजी का जिक्र आते ही अपने-अपने संस्मरण सुनाने लगते। कितना विशाल संपर्क था अटलजी का। एक बार जिस शहर में गए, वहां सैंकड़ों लोगों के दिलों में बस जाते थे। उनके व्यक्तित्व में एक ऐसा आकर्षण था, जो बरबस ही सबको अपनी ओर खींच लेता था। उनके विरोधी भी उनकी इस बात के कायल थे। भाजपा के विरोधी दलों के नेताओं के पास भी अटलजी के सहयोग के बहुत से संस्मरण हैं। भाजपा के धुर विरोधी रहे लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष श्री सोमनाथ चटर्जी ने तो अपनी किताब में अटलजी के महान व्यक्तित्व का उल्लेख किया है। माकपा के प्रमुख नेता रहे सोमनाथ चटर्जी का जो काम तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी टालती रहीं, उसे अटलजी ने दो घंटे में कर दिखाया।

अटलजी के व्यक्तित्व और कृतित्व की तुलना हम किसी से नहीं कर सकते। महात्मा गांधी हो या पंडित जवाहर लाल नेहरू। डा.श्यामाप्रसाद मुखर्जी हो या पंडित दीनदयाल उपाध्याय। इनमें से किसी से भी अटलजी की तुलना नहीं हो सकती। अटलजी की तुलना अगर होगी तो स्वयं अटलजी से ही होगी। अटल वाकई बहुत बड़े थे। भारतीय राजनीति में उन्होंने स्वयं को बेशक कभी बहुत बड़ा सिद्ध करने का प्रयत्न नहीं किया पर उनके कार्यों और विचारों के आधार पर हम उन्हें बहुत बड़ा मानते हैं। पहली बार ही लोकसभा में पहुंच कर तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू को चुनौती देने वाले अटल बिहारी वाजपेयी को सुनकर उन्हें कहना पड़ा था यह युवक अवश्य प्रधानमंत्री बनेगा। राजनीति में कभी उन्होंने पद पाने की लालसा नहीं जताई। भाजपा में तो वे प्रारम्भ से ही एक स्वाभाविक पसंद थे। भाजपा का हर कार्यकर्ता और शुभचिंतक ही नहीं देश की जनता की भी चाहत थी कि अटलजी लालकिले से झंडा फहरायें। 13 दिन की सरकार चलाने के बाद देशवासियों ने उन्हें 13 महीने और फिर पांच साल सरकार चलाने का अवसर दिया। यह अवसर उनके विचारों और कार्यों के कारण ही मिला। देश की समस्याओं को लेकर चिंता करने वाले और उनका हल निकालने में जुटे रहने वाले अटलजी उदास पलों में भी लोगों को हास्य से भर देते थे। उनका कहना था कि चुनौतियों का हंसकर सामना करेंगे तो चिंताएं भी ज्यादा देर तक नहीं टिकेगी।

अटलजी पर प्रधानमंत्री रहते हुए कोई दाग नहीं लगा पाया। इसी तरह हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी का कार्यकाल रहा। साढ़े चार साल के कार्यकाल में नरेंद्र मोदी सरकार पर कोई उंगली नहीं उठा पाया। अटलजी के व्यक्तित्व के तमाम पहलू हमें मोदीजी में दिखाई देते हैं। लोगों को यह जानकारी नहीं थी कि मोदीजी अटलजी के स्वास्थ्य को लेकर हमेशा चिंतित रहते थे। रोजाना वे अटलजी के स्वास्थ्य की रिपोर्ट लेते। महीने में एक बार उन्हें देखने घर जाते और परिवार को उनके शीघ्र स्वस्थ होने का ढांढस बताते। पूरे देश की जनता ने देखा कि अटलजी के निधन के बाद अंतिम यात्रा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रोटोकाल को तोड़ते हुए सुरक्षा नियमों की परवाह न करते हुए पैदल चलते रहे। एक पुत्र की भांति उन्होंने अटलजी को विदाई दी। देश हैरान कि ऐसा इस देश में किसी ने नही देखा कि अपने आदर्श रहे एक महान व्यक्तित्व को किसी प्रधानमंत्री ने ऐसी विदाई दी हो। मोदी के साथ उनके मंत्रिमंडल के सभी साथी और सांसद भी साथ थे। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भी साथ-साथ चलते रहे। ऐसे नजारे ने भी माहौल को और भावुक बना दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा ने जिस गति से आधार बढ़ाया है, उसे देखकर हर कोई यही कहता है कि अटल-अडवाणी ने दो सदस्यों की भाजपा को सत्ता तक पहुंचाया तो मोदी-शाह की जोड़ी ने पार्टी को देश के हर कोने में पहुंचा दिया। सचमुच अटलजी के एकदम सही उत्तराधिकारी नरेंद्र मोदी को देशवासियों ने राष्ट्र को विकास के मार्ग पर ले जाने के लिए नेतृत्व सौंपा है। अटलजी की लेखनी, वाणी और कर्म हमारे लिए हमेशा प्रेरणा के माध्यम रहेंगे। आने वाली पीढ़ियों के लिए अटलजी एक नए सशक्त और समृद्ध भारत की नींव रखने के लिए जाने जाएंगे।

India is much Bigger than the Premier League!

……और भी गम हैं ज़माने में, क्रिकेट के सिवाय !

आज सड़क से लेकर संसद तक I P L छाया हुआ है! कैसा दुर्भाग्य है कि जिस देश की संसद में I P L यानि इंडियन पॉवर्टी लाइन पर चर्चा होनी चाहिए उस देश की संसद में इंडियन प्रीमियर लीग पर चर्चा हो रही है. किसी शायर के शब्दों में बस इतना ही कहा जा सकता है कि – और भी गम हैं ज़माने में, क्रिकेट के सिवाय !!</div>
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<div>यह सही है कि इस देश में क्रिकेट एक जुनून है ! एक जुस्तजू  है! लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं है कि देश की संसद सारे ज़रूरी काम छोड़कर I P L पर बहस करने लगे !! क्या देश में महंगाई कम हो गई? क्या देश का रूपया डॉलर की तुलना में मजबूत हो गया? क्या चीनी ने अरुणाचल में हथियाई गई भारतीय ज़मीन को छोड़ दिया है? क्या गरीबी, भुखमरी और बेरोज़गारी जैसी समस्याएँ खत्म हो गई हैं? जो हमारे सांसद इन तमाम बड़े मुद्दों को छोड़कर I P L पर अपना सिर खपा रहे हैं !!

माना कि आई.पी.एल. में कुछ घटनाएं ऐसी हुई हैं जिन्होंने क्रिकेट को कलंकित किया है. स्पॉट फिक्सिंग का मामला हो या शाहरूख़ खान का विवाद, ल्यूक कि बदतमीजी हो या फिर प्रीती ज़िंटा की दादागिरी, इन सब मसलों ने भद्रलोक के खेल क्रिकेट को बदनाम किया है लेकिन ऐसा कहाँ नहीं होता? क्या हर जगह, हर संस्था में सब कुछ ठीक चल रहा है? क्या संसद और विधानसभाओं में सब कुछ ठीक है? क्या संवैधानिक संस्थाओं में हंगामे नहीं होते? क्या विधानसभाओं में कुर्सियां, माइक और जूते नहीं फेंके जाते? तो फिर आई.पी.एल. को लेकर इतना हंगामा क्यों? कहीं यह तमाम गंभीर समस्याओं से जन-मानस का ध्यान भटकाने का हथकंडा तो नहीं?

Value Every Relationship Wholeheartedly by Celebrating them.

आज मदर्स-डे है. सामान्य लोग इसे मनाएंगे, 

आदर्श लोग कहेंगे माँ के लिए तो हर दिन समर्पित होना चाहिए, संस्कृति के रखवाले कहेंगे ये पश्चिमी सभ्यता का प्रभाव है और माँ कहेंगी ‘बेटा मैं तो तुझे हमेशा खुश देखना चाहती हूँ और कुछ नहीं चाहिए’.

क्या आपने कभी यह सोचा कि इस तरह ‘माँ’, ‘पिता’, ‘दोस्त’, ‘बहन’, ‘भाई’ और हर रिश्ते को एक दिन समर्पित करने का उद्देश्य क्या है? अगर नहीं सोचा तो एक बार इस विषय पर ज़रूर सोचें. मैं यह मानता हूँ कि आज की प्रतिस्पर्धात्मक जीवनशैली में जब छोटा सा बच्चा भी रैंक बनाने में लगा है और हर सुबह सात बजे से इस दौड़ में निकल पड़ता है, रिश्तों को समय देना वाकई मुश्किल हो गया है और ऐसे में साल में एक दिन हर रिश्ते को समर्पित करना शौक या किसी का प्रभाव नहीं बल्कि समय की मांग है.
<div>हमारी भारतीय संस्कृति के अनुसार अगर हम जीवन व्यापन करें तो शायद इन चीज़ों की आवश्यकता नहीं पड़ती परन्तु समय के साथ-साथ विकास और प्रतिस्पर्धा दोनों ही बढती जा रहे हैं और सदियों पुराने सिद्धांतों में भी समय के साथ परिवर्तन अनिवार्य होता है. वैसे तो जन्मदिन मनाना भी आवश्यक नहीं क्यूंकि हम हर दिन अपने जीने की ख़ुशी मनाते हैं तो फिर साल में एक दिन क्यूँ निर्धारित करें? अगर जन्मदिन मनाना उचित है तो फिर रिश्तों की जीवंतता मनाना उनुचित कैसे हो सकता है? मैं आप सभी से यह अनुरोध करूँगा कि इन विभिन्न दिवसों को मनाने के उद्देश्य को समझें और रिश्तों को बेहतर बनाने के लिए आवश्यक समय दें.</div>
<div>आप सभी को मदर्स-डे की हार्दिक शुभकामनाएँ!</div>

Tripura, Nagaland and Meghalaya – Modi-Shah’s works gave the biggest victory

त्रिपुरा, नगालैंड और मेघालय- मोदी-शाह के कार्यों ने दिलाई सबसे बड़ी जीत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह की चुनावी रणनीति ने त्रिपुरा में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का मजबूत गढ धराशायी कर दिया।

मेघालय और नगालैंड में भाजपा गठबंधन की बड़ी जीत हुई है। कांग्रेस का त्रिपुरा, मेघालय और नगालैंड में सफाया हो गया। त्रिपुरा में तो कांग्रेस को कोई सीट ही नहीं मिली। त्रिपुरा की 20 जनजाति सीटों में कम्युनिस्ट एक भी सीट नहीं जीत पाए।

2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 36 फीसदी वोट मिले थे और इस बार केवल दो फीसदी। त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में भाजपा को मिली जीत, अब तक सबसे बड़ी जीत है।

त्रिपुरा में कम्युनिस्टों के सफाये ने साबित कर दिया है कि किसी भी राज्य में अब जनता निरकुंश सरकारों को सहन नहीं करेगी। यह दिखाई दे रहा है कि पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी सरकार और ओडिशा में नवीन पटनायक की सरकार भी अब चलता होगी। त्रिपुरा में भाजपा की जीत ने पश्चिम बंगाल और केरल के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और पार्टी कार्यकर्ताओं का हौंसला बुलंद कर दिया है। हमें पूरी उम्मीद है आने वाले दिनों में पश्चिम बंगाल की जनता ममता बनर्जी की सरकार को उखाड़ फेकेंगी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर पूर्व के राज्यों के लिए पूरी ईमानदारी से कार्य किया। असम, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश के बाद अब त्रिपुरा, नगालैंड और मेघालय में भी भाजपा की सरकारें होंगी। नरेंद्र मोदी सरकार ने पहली पूर्वोत्तर के विकास पर ध्यान दिया। पहले पूर्वोत्तर के राज्यों में रही सरकारों ने केंद्र सरकार द्वारा भेजे जाने वाली राशि का इस्तेमाल ही नहीं किया।
जनता विकास के लिए तरसती रही। मोदी सरकार के कार्यों और नीतियों में आस्था जताते हुए त्रिपुरा, मेघालय और नगालैंड की जनता ने यह एतिहासिक निर्णय सुनाया है। अगर त्रिपुरा की बात करें तो वहां पिछले 25 साल से माकपा की सरकार थी। त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार ने प्रपंच करके अपनी छवि एक साधारण और ईमानदार नेता की बना रखी थी। जनता ने उनके भ्रष्टाचार और निरकुंश होने की पूरी पोल खोल दी है। सभी जानते हैं कि त्रिपुरा में कम्युनिस्ट पहले ताकत के बल पर चुनावों में धांधली करके जीतते रहे हैं। इस बार जनता ने राज्य में कम्युनिस्टों को उखाड़ फेंकने का संकल्प लेते हुए कम्युनिस्टों को चुनावों में धांधली करने का मौका ही नहीं दिया।

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने भी त्रिपुरा में ऐसी चुनावी रणनीति बनाई कि कम्युनिस्ट धराशायी हो गए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मंत्रिमंडल के सदस्यों को बार-बार त्रिपुरा भेजा। बाकी पूर्वोत्तर के राज्यों में मंत्रियों ने दौरे किए। जनता से मुलाकात की, उनकी समस्याओं का जाना और निराकरण किया। पहली बार पूर्वोत्तर की जनता ने प्रधानमंत्री को बार-बार इतने नजदीक से देखा।

प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता और अमित शाह की रणनीति ने भाजपा को पूरे देश की पार्टी बना दिया है। ध्यान देने वाली बात है कि 2013 के चुनाव में भाजपा को कम्युनिस्टों के गढ़ में केवल डेढ़ फीसदी वोट मिले थे। इस बार भाजपा गठबंधन को लगभग 50 फीसदी मत मिले हैं।

भाजपा को खुद 42 फीसदी वोट मिले हैं, जबकि उसकी सहयोगी पार्टी पीपल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा को 8.5 फीसदी वोट मिले हैं। इस तरह त्रिपुरा की आधी जनता ने भाजपा वोट दिया है। पहले कम्युनिस्ट पश्चिम बंगाल से साफ और अब त्रिपुरा से, बस अब बचे हैं केरल में हैं। अब देश की जनता विकास के एजेंडे पर चलना चाहती है। त्रिपुरा, नगालैंड और मेघालय की जनता ने बता दिया है कि अब उन्हें विकास करने वाली सरकारें चाहिए। ये तीनों राज्य भी केंद्र सरकार के साथ मिलकर तेजी से विकास की तरफ बढेंगे।

Save children’s childhood!

“हर चीज़ के फायदे और नुक्सान होते हैं, यह हम पर निर्भर करता है कि हम किस पहलु को स्वयं पर हावी होने देते हैं.” मैं आज तक यही सोचता आया था लेकिन आज एक गाँव से गुज़रते वक़्त कुछ बच्चों को सड़क पर खेलते देख मुझे एकाएक शहरों की खाली गलियों का नज़ारा याद आया. शहरों की आधुनिक जीवनशैली ने कहीं न कहीं बच्चों से उनका बचपन छीन लिया है. आज बच्चे गलियों में नहीं बल्कि मोबाइल और कंप्यूटर पर गेम खेलते दिखाई देते हैं. भाग-दौड़ वाले खेल जैसे अब कहीं लुप्त होते जा रहे हैं. कुछ खेल जो बच्चे खेलते…

Jan Sunwai in Omkareshwar

Jan Sunwai in Omkareshwar

ओमकारेश्वर में जन सुनवाई के दौरान मन में सिर्फ यही ख्याल है कि मैं आप सभी की पीड़ा को बेहतर रूप से समझ सकूँ और सर्वश्रेष्ठ विकल्प निकाल सकूँ जिससे आप सभी की परेशानियां दूर हो सकें!

Rahul’s gimmick in parliament

संसद में राहुल की नौटंकी

कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर अपना भाषण खत्म करते हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सीट पर जाकर उनके गले पड़ते हैं। इसके बाद अपनी सीट पर आते हैं और कांग्रेस के सदस्य ज्योतिरादित्य सिंधिया की तरफ कुटिल मुस्कान फेंकते हुए एक आंख मारते हैं। लोकसभा का यह पूरा नजारा देश ने देखा। लोगों को लगा यह संसद है या कॉलेज की कैंटीन। सच में नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली राष्ट्रीय जनतांत्रित गठबंधन की सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर जिस तरह लोकसभा में बहस की शुरुआत हुई, उससे तो यही लगा कि विपक्ष के नेताओं के पास मुद्दे ही नहीं है। राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमन पर राफेल सौदे पर बेसिरपैर के आरोप लगाए। लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने इस मुद्दे पर निर्मला सीतारमन को सफाई का मौका दिया तो उन्होंने कागजात दिखाते हुए बताया कि यूपीए सरकार और फ्रांस सरकार के बीच सौदे की शर्तों को गोपनीय रखने का करार हुआ था। राहुल गांधी के पास निर्मला सीतारमन की सफाई पर कोई जवाब देते नहीं बना। राहुल को केवल नौटंकी करनी थी, उन्होंने की और सिंधिया को तरफ यही देखकर आंख मारी कि बना दिया पप्पू।लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव की चर्चा शुरुआत करते जिस तरह तेलुगू देशम पार्टी के सांसद जयदेव गल्ला ने कहा कि हम धमकी ने श्राप दे रहे हैं, उससे यही लगता है कि अविश्वास प्रस्ताव की कोई जरूरत ही नहीं थी। भाजपा के राकेश सिंह ने आंकड़ों के साथ मजबूती से अपनी बात रखी। देश की जनता जानती है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राजनीतिक आधार पर किसी प्रदेश, इलाके, वर्ग या समुदाय के साथ कोई भेदभाव नहीं करते हैं। उनका ही नारा है सबका साथ-सबका विकास। तेलुगू देशम के सदस्यों ने राजनीतिक समीकरणों के कारण ही मोदी सरकार पर हमला बोला है। आंध्र प्रदेश के साथ बुंदेलखंड से भी ज्यादा भेदभाव हुआ, इससे तो पूरे विपक्ष की धार को उन्होंने भौंथरा बना दिया। मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड का जिस तरह से विकास हुआ, वह देश के सामने है। इसी तरह उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड का योगी सरकार में तेजी से विकास हो रहा है।कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने लोकसभा में कहा कि भारतीय जनता पार्टी के सांसदों ने उनके भाषण पर उन्हें बधाई दी। राहुल गांधी इस कथन पर भाजपा के सदस्य केवल मुस्करा ही सकते थे। अकाली बादल की हरसिमरत कौर पर उन्होंने मुस्कराने की बात कही। उनकी इस बाद हरसिमरत ने कहा कि पप्पी-झप्पी लगने का इलाका नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विपक्षी दलों के हमलों के बीच सहज रूप से मुस्कराते रहे। सबसे बड़ी बात यह है कि विपक्ष के नेता जुमलेबाजी की बात करते रहे। केंद्र सरकार पर कोई ठोस आरोप नहीं लगा पाया। राहुल गांधी ने महिलाओं पर अत्याचार की बात की। उनका कहना था कि दुनिया में महिलाओं पर अत्याचार के मामलों में छवि खराब हुई। राहुल जी यह भूल गए कि जितना ध्यान मोदी सरकार ने महिलाओं पर दिया, आज तक किसी सरकार ने नहीं दिया। पांच करोड़ परिवारों को मुफ्त गैस कनेक्शन देकर उन्हें धुएं से मुक्ति दिलाई है। मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक और हलाला जैसी कुरीतियों से बचाया गया है। अविश्वास चर्चा पर विपक्षी दलों की बहस को देखकर यही लगा कि इन दलों के पास मोदी सरकार और भाजपा के खिलाफ कोई मुद्दा नहीं है। सदन में बहस को गिरता स्तर देखकर यही लगता है कि विपक्ष के नेता क्या चौराहे पर भाषण दे रहे हैं।

Accurate decision on delicate occasions- Modi’s conviction

नाजुक मौकों पर सटीक निर्णय-मोदी के कायल हुए लोग

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोगों के प्रति संवेदनशीलता की झलक देश ने पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की रैली के दौरान पंडाल गिरने से घायलों को अस्पताल जाकर उनकी हालत देखने और हौंसला बंधाने पर देखी। पश्चिमी मेदिनीपुर जिले के ऐतिहासिक शहर मेदिनीपुर में 16 जुलाई को आयोजित भाजपा की विशाल रैली कई मायनों में ऐतिहासिक रही। प्रधानमंत्री ने जिस तरह से रैली में पंडाल गिरने से घायल हुए लोगों को लेकर संवेदनशीलता दिखाई, उसे लेकर लोग कायल हुए हैं। प्रधानमंत्री की संवेदनशीलता को देखने का यह पहला अवसर नहीं है, ऐसी बातें हम लोग पहले भी कई बार देख चुके हैं। संवदेनशीलता के कारण ही प्रधानमंत्री मोदी ने गरीबो, किसानों, मजदूरों और महिलाओँ को अपनी नीतियों और योजनाओं में प्राथमिकता दी है। रैली में घायलों के इलाज और उनकी देखरेख की व्यवस्था पश्चिम बंगाल भाजपा के अध्यक्ष दिलीप घोष को सौंपकर ही प्रधानमंत्री रवाना हुए। रवाना होने के बाद भी प्रधानमंत्री लगातार घायलों की जानकारी लेते रहे। यह सब बातें मीडिया के माध्यम से जन-जन तक पहुंची और लोगों ने प्रधानमंत्री की संवेदनशीलता को महसूस भी किया। रैली के दौरान पंडाल गिरने और लोगों के घायल होने और अस्पताल पहुंचाने की संवेदनशीलता को भाजपा की रैली के दौरान मंच पर उपस्थित हम सब ने उनकी नाजुक मौके पर सूझबूझ, धैर्यता, कर्तव्यपरायणता और तुरंत फैसले की क्षमता को नजदीक से देखा। प्रधानमंत्री मोदी की छवि हमेशा उचित निर्णय लेने की रही है। संकट के समय सही फैसले लेकर वे हमेशा बाजी पलट देते हैं।

राजनीतिक हमलों को लेकर सटीक जवाब देने वाले प्रधानमंत्री मोदी ने मंच से पंडाल गिरने के दौरान और बाद में जिस तरह सूझबूझ से निर्णय लिया और सुरक्षा अधिकारियों को निर्देश दिए, उससे एक बड़ा हादसा टल गया और कई लोगों की जानें बच गईं। पंडाल गिरने और लोगों के घायल होने के बावजूद प्रधानमंत्री ने अपनी दूरदर्शिता के कारण किसी तरह की भगदड़ होने या अफरातफरी मचने का माहौल नहीं बनने दिया। हम लोगों को भी नाजुक मौके पर उनकी सूझबूझ, धैर्य और दृढ़ता के साथ कार्य करने से सीख मिलती है। हमें यह तो पता ही है कि प्रधानमंत्री मोदी के शब्दकोश में असंभव शब्द नहीं है। किसी कार्ययोजना में प्रधानमंत्री न की बजाय की संभावनाओं पर विचार करते हैं। हमने यह भी देखा है कि मोदीजी रैली में अतिउत्साही लोगों को खंभों पर चढ़ने से भी रोकते हैं। याद कीजिए पटना की 27 अक्टूबर 2013 को गांधी मैदान में भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की ‘हुंकार रैली’ की। रैली के पहले गांधी मैदान में पांच और पटना जंक्शन पर दो बम धमाके हुए। इन धमाकों में आधा दर्जन लोग मारे गए थे और 83 घायल हुए थे। उस समय गांधी मैदान खचाखच भरा हुआ था। अचानक धमाकों पर धमाकों होने लगे। मोदीजी धैर्य के साथ भाषण देते रहे। कोई भगदड़ नहीं मची। अगर भगदड़ मचती तो कई जाने जा सकती थीं।

लोगों ने यह तो देखा कि मेदिनीपुर में कृषक कल्याण सभा को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संबोधित कर रहे थे, उसी दौरान मंच के बाईं ओर मुख्य प्रवेश द्वार के बगल में लगाया गया पंडाल अचानक गिर गया। उस समय सभा में ढाई लाख से ज्यादा लोग मौजूद थे। गिरने वाले पंडाल के नीचे ही 20 हजार से ज्यादा लोग बैठे हुए थे। इनमें महिलाओं की तादाद भी बहुत थी। पंडाल गिरने से 24 महिलाएं घायल हुईं है। सभा के दौरान रिमझिम बारिश के बीच प्रधानमंत्री मोदी मंच पर पहुंचे। दोपहर 12.30 बजे प्रधानमंत्री मंच पर पहुंचे, उस समय तक कॉलेजिएट मैदान खचाखच भर गया था। लोग उत्सुकता से प्रधानमंत्री को सुनने का इंतजार कर रहे थे। रैली के लिए तीन पंडाल बनाए गए थे। तीनों पंडालों के खचाखच भरने और भारी संख्या में लोगों के मैदान के बाहर जमा होने के कारण हम सब बहुत प्रसन्न थे। भाजपा की तरफ से इतनी विशाल रैली अभी तक पश्चिम बंगाल में नहीं हुई थी।

प्रधानमंत्री मोदी जब भाषण दे रहे थे तो उन्होंने पंडाल गिरते देख लिया था। अपने भाषण के बीच पंडाल गिरते हुए देखकर उन्होंने यह आभास नहीं होने दिया कि बड़ी दुर्घटना हो गई है। प्रधानमंत्री ने भाषण जारी रखते हुए लोगों से कहा भी कि कोई खास बात नहीं है। अपने भाषण के दौरान ही अपने सुरक्षा अधिकारियों और स्वास्थ्य सेवाओं में लगे अधिकारियों को तुरंत उन्होंने कुछ ही पलों में संदेश भी पहुंचा दिया। लोगों ने देखा कि अचानक प्रधानमंत्री ने कुछ सैंकिड के लिए एक सुरक्षा अधिकारी के कान में कुछ फुसफुसाया और फिर भाषण देने लगे। प्रधानमंत्री की सुरक्षा में लगे अधिकारियों ने तुरंत कार्रवाई करते हुए घायलों को निकालने का काम बिना शोरशराबे के शुरु कर दिया। प्रधानमंत्री के निर्देश पर उनके साथ चलने वाले स्वास्थ्य विभाग के दस्ते ने भी घायलों का इलाज तुरंत शुरु कर दिया। प्रधानमंत्री भाषण देते रहे और उन्हें घायलों की हर खबर लगातार अधिकारी पर्ची के माध्यम से देते रहे। भाषण के दौरान प्रधानमंत्री पर्ची पर नजर डालते हुए अपना भाषण देते रहे। प्रधानमंत्री ने एक पंडाल में जमा हुए 20 हजार लोगों के अलावा दो अन्य पंडालों में बैठे 2.30 लाख लोगों को इस दुर्घटना का आभास तक नहीं होने दिया। मंच पर बैठे लोगों को धुकधुकी लगी हुई थी कि कहीं भगदड़ न मच जाए, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। अगर भगदड़ मच जाती तो एक बड़ी दुर्घटना हो सकती है। भागती भीड़ के कारण कुछ भी हो सकता था। कुछ लोग कुचल भी सकते थे। 55 मिनट बाद प्रधानमंत्री का भाषण समाप्त हुआ। तुरंत मंच से उतरकर प्रधानमंत्री प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष को साथ लेते हैं और अस्पताल पहुंच जाते हैं। बिना सुरक्षा इंतजामों के बीच प्रधानमंत्री अस्पताल पहुंचने पर लोग हैरान हो जाते हैं। उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था कि उनके प्रधानमंत्री उनका हालचाल पूछने अस्पताल पहुंच गए। प्रधानमंत्री ने अपनी इन्हीं खूबियों के कारण किसी तरह की अफरातफरी का माहौल ही नहीं बनने दिया। प्रधानमंत्री ने घायलों से उनका हालचाल जाना, उन्हें हिम्मत बंधाई और आटोग्राफ दिए। प्रधानमंत्री ने वाकई जनता का दिल जीत लिया। इसका एक दुखद पहलू यह भी है कि पश्चिम बंगाल की पुलिस इस दौरान कहीं भी नहीं दिखाई। पश्चिम बंगाल सरकार कोई सबक लेने के बजाय इस मुद्दे पर राजनीति करने पर आमादा है।

भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री कैलाश विजयवर्गीय पश्चिम बंगाल के प्रभारी हैं।

West Bengal – The killing of democracy

प बंगाल- लोकतंत्र की हत्या

दुनियाभर में भारतीय लोकतंत्र की शक्ति का डंका बजता है। इतने बड़े लोकतांत्रिक देश में पश्चिम बंगाल में होने वाले पंचायत के चुनावों ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। कलकत्ता हाई कोर्ट ने राज्य चुनाव आयोग को नामांकन भरने के दौरान सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम न होने पर फटकारा भी। राज्य चुनाव आयोग की पहले नामांकन की तारीख बढ़ाने और फिर वापस लेने के फैसले पर भी सवाल उठाये। पश्चिम बंगाल सरकार और राज्य चुनाव आयोग ने हाई कोर्ट के निर्देशों का पालन भी नहीं किया। ऐसे में पश्चिम बंगाल में पंचायत के चुनाव के दौरान आम लोगों के लोकतांत्रिक और मानवाधिकारों का खुलेआम उल्लंघन किया जा रहा है। चुनाव में नामांकन भरने के दौरान हिंसा का सहारा लेकर तृणमूल कांग्रेस के गुंडों ने सरकार और पुलिस के संरक्षण में राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों को नामांकन भरने से रोका। भारतीय जनता पार्टी और अन्य दलों के उम्मीदवारों को डराने के लिए बम फेंके गए, सरेआम पिटाई की गई, दलों के दफ्तर फूंक दिए गए। राज्य चुनाव आयोग द्वारा नामांकन भरने से रोकने की शिकायतों के बावजूद राज्य चुनाव आयोग ने तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवारों को 34 फीसदी से ज्यादा यानी 20 हजार पंचायत सीटों पर निर्विरोध निर्वाचित घोषित कर दिया। यह भारतीय लोकतंत्र में इतिहास में एक काला अध्याय माना जाएगा।

इस तरह से पश्चिम बंगाल के पंचायत चुनाव के दौरान सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के समर्थक गुंडों ने हिंसा फैलाकर लोकतंत्र की हत्या कर दी है। विरोधी दलों के कार्यकर्ताओं और समर्थकों को चुनाव में हिस्सा न लेने देने के लिए प्रशासन और पुलिस ने तृणमूल कांग्रेस के गुंडों का पूरा साथ दिया। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी की सरकार में महिलाओं की इज्जत भी लगातार तार-तार हो रही है। तृणमूल कांग्रेस की गुंडागर्दी की ताजा घटना ने सब को झकझोर कर रख दिया है। नादिया की एक महिला भाजपा प्रत्याशी के घर तृणमूल कांग्रेस के गुंडों ने मारपीट की। प्रत्याशी के न मिलने पर उनकी छह महीने की गर्भवती देवरानी के साथ बलात्कार किया। इतना ही नहीं इस कृकत्य को छिपाने के लिए सरकारी अस्पताल ने ममता बनर्जी के डर से उसका इलाज करने से भी मना कर दिया। इस गर्भवती महिला का इलाज एक निजी अस्पताल में चल रहा है और बच्चे के जीवित बचने की संभावना न के बराबर है। चुनाव में जीत का परचम फहराने के लिए तृणमूल समर्थकों द्वारा दलितों और अल्पसंख्यकों को भी निशाना बनाया जा रहा है। पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र की हत्या कर ममता बनर्जी पंचायत चुनाव में किसी भी तरह जीत दर्ज कर अगले लोकसभा चुनाव में विरोधी दलों की तरफ से प्रधानमंत्री पद की दावेदारी पर दावा पेश करने वाली हैं। हैरानी की बात है कि हाई कोर्ट के तमाम निर्देशों के बावजूद पंचायत चुनाव में सुरक्षा के इंतजाम नहीं किए जा रहे हैं। हत्या, मारपीट, बमबारी और बलात्कार की लगातार जारी घटनाओं के बीच सरकारी संरक्षण में तृणमूल समर्थकों ने पंचायत चुनाव में एक तिहाई सीटों पर जीत हासिल कर ली है। कम्युनिस्टों की गुंडागर्दी को खत्म करने के लिए सत्ता हासिल करने वाली ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस पार्टी ने अब उन्हें भी विरोधियों का खात्मा करने की नीति में पीछे छोड़ दिया है।

राज्य चुनाव आयोग ने जानकारी दी है कि तृणमूल कांग्रेस ने त्रिस्तरीय पंचायतों में 34.2 फीसदी सीटों पर निर्विरोध जीत हासिल की है। इसी तरह का खेल 2003 के पंचायती चुनावों में कम्युनिस्टों की सरकार के समय खेला गया था। तब कम्युनिस्टों ने 11 फीसदी सीटों पर बिना मुकाबले के जीत हासिल की थी। ममता बनर्जी कम्युनिस्टों से तीन गुणा ज्यादा बढ़ गई हैं, इस कारण कम्युनिस्टों के मुकाबले उनका पतन भी जल्दी होगा। अबकी बार तृणमूल कांग्रेस ने त्रिस्तरीय पंचायतों में लगभग 20 हजार सीटों पर जीत हासिल की है। तृणमूल कांग्रेस के गुंडों ने सभी जिलों में भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस और वाममोर्चो के कार्यकर्ताओं को चुनाव में नामांकन करने से रोकने के लिए हिंसा का सहारा लिया। जहां-जहां भाजपा के कार्यकर्ताओं ने नामांकन भरा, वहां उन्हें भगाने की कोशिश की गई। घरों में तोड़फोड़ की गई। बड़ी संख्या में भाजपा समर्थकों को दूसरी जगह जाकर शरण लेनी पड़ रही है। तृणमूल समर्थकों की बमबारी, हत्या, बलात्कार आदि की घटनाओं के बावजूद भाजपा ने पंचायत चुनाव में नामांकन करने में कम्युनिस्टों को भी पीछे छोड़ दिया है। भाजपा की बढ़ती ताकत के कारण निर्विरोध जीते गए हमारे उम्मीदवारों को धमकाकर तृणमूल में शामिल करने की कोशिश की जा रही है।

पश्चिम बंगाल में 3,358 ग्राम पंचायतों की 48,650 सीटों, 341 पंचायत समितियों की 9,217 सीटों और 20 जिला परिषदों की 825 सीटों 14 मई को होने वाले चुनाव पर कलकत्ता हाई कोर्ट की ताजा टिप्पणी के बाद संशय है। लेकिन पंचायत चुनाव में दाखिल नामांकन पत्रों को देखे तो तृणमूल की तरफ से एक हजार, भाजपा ने 782, माकपा ने 537 और कांग्रेस की तरफ से 407 पर्चे सही पाए गए हैं। पंचायत समितियों के लिए तृणमूल कांग्रेस के 12,590 उम्मीदवार, भाजपा के 6,149, माकपा के 4400 और कांग्रेस के 1740 उम्मीदवार मैदान में हैं। ग्राम पंचायतों के लिए तृणमूल ने 58,978, भाजपा ने 27,935, माकपा ने 17,319 और कांग्रेस ने 7,313 नामांकन दाखिल किए हैं। उम्मीदवारों की संख्या में तो भाजपा ने कम्युनिस्टों और कांग्रेसियों को पीछे छोड़ ही दिया है साथ ही तृणमूल कांग्रेस की गुंडागर्दी का जवाब देने में में भाजपा ने पूरी हिम्मत दिखाई है। भाजपा के कार्यकर्ता तृणमूल समर्थकों की तमाम कोशिशों के बावजूद नामांकन पत्र भरने में सफल रहे हैं पर तृणमूल उम्मीदवारों के 34 फीसदी सीटों पर बिना मुकाबला जीतने की घोषणा से पूरी चुनाव प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो गए हैं। राज्य चुनाव आयोग को पश्चिम बंगाल सरकार की तरफ से पर्याप्त सुरक्षा भी उपलब्ध नहीं कराई जा रही  है। केंद्रीय सुरक्षा बलों को तैनात करने की बजाय दूसरे राज्यों से फोर्स मांगी जा रही है। पंचायत चुनाव के लिए 58 हजार से ज्यादा बूथों पर मतदान होगा और राज्य के पास 46 हजार हथियार वाले और 12 हजार लाठीदार पुलिस वाले हैं। सरकार के पास एक बूथ पर दो सुरक्षाकर्मी तैनात करने का इंतजाम भी नहीं है। जब नामांकन भरने के दौरान जितनी हिंसा तृणमूल समर्थकों ने फैलाई है, उससे अंदाजा लगा सकते हैं कि मतदान के दिन क्या हो सकता है। तृणमूल कांग्रेस की तरफ से पूरी कोशिश हो रही है कि विरोधियों का चुनाव से सफाया कर दिया जाए। हिंसा की तमाम घटनाओं के खिलाफ जगह-जगह भाजपा, माकपा और कांग्रेस की तरफ से धरना-प्रदर्शन भी हुए पर वामदलों और कांग्रेस के बड़े नेताओं की चुप्पी क्या साबित कर रही है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और उनकी मां सोनिया गांधी बार-बार ममता बनर्जी की तारीफ तो कर रहे हैं पर अपने कार्यकर्ताओं की पिटाई पर चुप क्यों हैं। इसी तरह वामदलों के नेताओं ने भी ममता सरकार पर कोई हमला नहीं बोला है। पश्चिम बंगाल में भाजपा की ममता सरकार की मनमानी का जवाब दे रही है। ममता बनर्जी के पूरी तरह से राहुल गांधी को नकारने के बावजूद उनकी चुप्पी क्या साबित कर रही है। शायद विपक्षी दलों की एकता के नाम पर राहुल गांधी ने पश्चिम बंगाल में अपने कार्यकर्ताओं की बलि देना भी मंजूर कर लिया है। पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र की हत्या को लेकर उठे सवालों का जवाब वहां की जनता आने वाले दिनों में जरूर देगी।

West Bengal: Wounds in the Chest of Democracy, Worried, PM Narendra Modi

पश्चिम बंगाल- लोकतंत्र के सीने में घाव ,चिंतनीय।PM नरेंद्र मोदी

दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम बंगाल में पंचायत चुनाव के दौरान हिंसा, आगजनी, बमधमाके, लूटमार, सरकारी तंत्र की मनमानी आदि को लेकर चिंता जताई है। पश्चिम बंगाल के पंचायत चुनाव के मतदान के दिन ही 19 लोगों की मौत हुई। उसके अगले दिन हुई हिंसा में पांच और लोग मारे गए। मतदान के दिन ऐसा कोई इलाका नहीं था जहां हिंसा न हुई हो। खूनी चुनावों को लेकर प्रधानमंत्री ने यह अपील भी की है कि लोकतंत्र के सीने पर घाव देने वाले विषय पर सभी राजनीतिक दलों, नागरिक समाज और न्यायपालिका को ध्यान देना होगा। उन्होंने नामांकन से लेकर मतदान तक की प्रक्रिया को लेकर चिंता जताई और कहा कि पंचायत चुनाव में लोकतंत्र की हत्या की गई है। बंगाल की पिछली शताब्दी को देखें जिसने  देश को मार्गदर्शन देने का काम किया है। ऐसी महान भूमि को राजनीतिक स्वार्थ के लिए लहुलूहान कर दिया गया। प्रधानमंत्री ने इस मुद्दे पर चिंता जताते हुए पश्चिम बंगाल की जनता का दुख सबके सामने रखा है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की गुंडागर्दी, मनमानी और विपक्षी दलों पर अत्याचारों को लेकर सभी राजनीतिक दल आक्रोश जता रहे हैं। रोजाना जगह-जगह विरोध में प्रदर्शन हो रहे हैं। मतदान के बाद भी भारतीय जनता पार्टी के समर्थकों और कार्यकर्ताओं के घरों पर हमले हो रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि तृणमूल कांग्रेस के नेता, प्रशासन और पुलिस हत्या, आगजनी, बम धमाके आदि की घटनाओं को मामूली बता रहे हैं।

दुनियाभर में भारत के लोकतंत्र के उदाहरण दिए जाते हैं, लेकिन यहां हाल ही में हुए कर्नाटक विधानसभा चुनाव और पश्चिम बंगाल के पंचायत चुनाव में धनबल के बढ़ते इस्तेमाल पर सवाल खड़े कर दिए हैं। कर्नाटक विधानसभा चुनाव के दौरान सवा सौ करोड़ की नगदी बरामद की गई। साथ ही 24.43 लाख रुपये की 5 लाख 26 हजार 766 लीटर शराब जब्त की गई है। इसके अलावा व्हिस्की की 8640 बोतलें भी जब्त की गई हैं। चुनाव आयोग के अनुसार चार करोड़ से ज्यादा का सोना भी पकड़ा गया।14 करोड़ 91 लाख 62 हजार 715 रुपये कीमत के अन्य सामान भी बरामद किए गए हैं। 219 वाहनों को जब्त भी किया गया है। कर्नाटक के राजराजेश्वरी नगर विधानसभा क्षेत्र के एक फ्लैट से दस हजार मतदाता पहचान पत्र बरामद होने के बाद चुनाव आयोग ने इस सीट पर मतदान स्थगित कर दिया है। अब इस सीट पर 28 मई को मतदान होगा। आयोग की ओर से जारी आदेश में कहा गया है इस सीट पर चुनाव प्रचार के दौरान मतदाताओं को लुभाने के लिये तमाम वस्तुयें बांटने और भारी मात्रा में फर्जी मतदाता पहचान पत्रों की बरामदगी जैसी अन्य घटनाओं की शिकायतें शुरुआती जांच में ठीक पाये जाने के बाद यह फैसला किया है। राजनीतिक दलों के बीच कुर्सी कब्जाने की होड़ के कारण चुनाव में धन का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है। मीडिया में आई खबरों के अनुसार इस विधानसभा चुनाव में पिछले चुनाव के मुकाबले दोगुना खर्च हुआ है। जाहिर है चुनाव आयोग की सख्ती से सवा सौ करोड़ की नगदी बरामद होने के बावजूद चुनाव में धन का इस्तेमाल हुआ।

प्रधानमंत्री का यह कहना कि कोई चुनाव जीते, कोई हारे लेकिन ‘लोकतंत्र के सीने पर घाव उभारने के विषय पर सभी राजनीतिक दलों, नागरिक समाज और न्यायपालिका को ध्यान देना होगा, सभी को सोचने पर मजबूर करता है। पश्चिम बंगाल के पंचायत चुनावों में 34 फीसदी सीटों पर विरोधी दलों के उम्मीदवारों को नामांकन ही नहीं करने दिया गया। नामांकन न करने देने और अन्य शिकायतों को लेकर सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में अपील की गई। हाई कोर्ट को पश्चिम बंगाल के चुनाव आयोग को कहना पड़ा कि निष्पक्षता नहीं बरती जा रही है। मतदान के दौरान हिंसा रोकने के निर्देश देने के बावजूद पश्चिम बंगाल सरकार ने पूरे इंतजाम नहीं किए। यह सब बूथों पर जबरन कब्जा करने के लिए किया गया। बूथों पर कब्जे के दौरान तमाम स्थानों पर पुलिस वाले मूकदर्शक बने रहे।

मतदान के दिन विरोधी दलों के कार्यकर्ताओं को जिंदा जला दिया गया। कुछ स्थानों पर हिंसा मतदान के दो दिन बाद भी जारी है। तृणमूल कांग्रेस के गुंडों की चेतावनी न मानने वाले लोगों के घरों को जलाया जा रहा है। तृणमूल कांग्रेस का समर्थन न करने वालों को धमकी के कारण दूसरे स्थानों पर शरण लेनी पड़ी है। बड़ी संख्या में लोग अपने-अपने घरों में लौटने से डर रहे है। भाजपा के अलावा माकपा के प्रमुख नेताओं ने भी तृणमूल कांग्रेस की गुंडागर्दी का विरोध किया है। पश्चिम बंगाल कांग्रेस के नेता ममता बनर्जी सरकार की तानाशाही का विरोध कर रहे हैं पर बड़े नेता चुप क्यों हैं?

अब समय आ गया है कि रक्तरंजित चुनावों को लेकर सभी को सोचना है। क्या कोई शासक दल कुर्सी कब्जाने के लिए निर्दोष लोगों की जान लेता रहेगा ? तृणमूल कांग्रेस का समर्थन न करने वाले लोगों को घऱों में रहना दूभर हो गया है। उनके कारोबार को बंद कराया जा रहा है। घरों को जलाया जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने पश्चिम बंगाल में लहूलुहान लोकतंत्र की तरफ देश का ध्यान आकर्षित किया है। प्रधानमंत्री की चिंता को लेकर अब समाज के सभी वर्गों को इस मुद्दे पर सोचना होगा।