Happy Birthday Amitabh Bachchan

जिनके अभिनय का सिक्का देश में ही नहीं विश्व में माना गया है उस महानायक के जन्मदिन की आप सभी को बहुत-बहुत बधाइयां! अमिताभ बच्चन सिर्फ देश के लिए ही नहीं हम सभी के लिए गौरव का विषय हैं! अमिताभ जी ने पर्दे पर जो भी किरदार निभाया उसे जीवंत कर दिया. आज उनके जन्मदिन पर मैं जानना चाहूँगा कि उनका कौन सा किरदार आपका सबसे पसंदीदा है?

Importance of today

आज के दिन का महत्व

आज का दिन वाकई बहुत महान है और इस तारीख का इतिहास में ही नहीं भविष्य में भी महत्व बरक़रार रहेगा. इस तारीख को महान बनाया है लोकनायक जयप्रकाश नारायण, सामाजिकनायक नानाजी देशमुख और महानायक अमिताभ बच्चन ने. आज इन सभी महान हस्तियों का जन्मदिन है और इन्होंने अपनी अलग सोच, अथक प्रयासों और नवीन शैली से समाज में बदलाव की पहल की और इसही के परिणाम स्वरुप आज की तारिख अमर हो गई.

जे.पी. नारायण के सामर्थ्य से ही पहली बार देशवासी गैर कांग्रेसी सरकार के बारे में सोच पाए और यह उनके दृढ़ संकल्प का ही नतीजा है कि देश को बेहतर राजनीतिक पार्टियों का नेतृत्व मिल पाया.नानाजी देशमुख एक कुशल और सक्रीय सामाजिक कार्यकर्ता थे. उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण क्षेत्रों की आत्मनिर्भरता के लिए सराहनीय कार्य किए हैं और वे पद्म विभूषण पुरस्कार से सम्मानित भी हैं.

महानायक अमिताभ बच्चन ने अपनी अभिनय शैली से बॉलीवुड को नई दिशा दिखाई और हर पीढ़ी के दिल में अपनी एक अलग जगह बनाई. वे विश्व स्तर पर अपने हुनर से भारत का नाम रोशन कर रहे हैं.

हम सभी अगर अपनी जन्मतिथि को महान बनाना चाहते हैं तो ज़रूरी है कि अपने क्षेत्र में लगातार बेहतर प्रदर्शन के लिए प्रयासरत रहें! युवा पीढ़ी से भी हम सभी को यही आशा है!

Hindi divas kyoon manaaya jaata hai?

हिन्दी दिवस क्यूँ मनाया जाता है?

हिन्दी दिवस के दिन पिछले कुछ सालों से सभी इस बात पर बात नहीं कर रहे हैं कि हम इसे क्यूँ मनाते हैं बल्कि इस विषय को उठाया जा रहा है कि हिन्दी का ‘अस्तित्व’ लुप्त होता जा रहा है. क्या एक हिन्दुस्तानी की ज़िन्दगी में कभी भी ‘हिन्दी का अस्तित्व’ लुप्त हो सकता है?

आज मैंने फेसबुक पर हिन्दी दिवस मनाने का कारण जब पूछा तो जाना कि अधिकाँश लोगों को तो हिन्दी दिवस मनाने का कारण ‘हिन्दी का अस्तित्व’ बचाना लगता है. मीडिया और समाज की प्रसिद्ध शख्सियतों ने ‘हिन्दी के अस्तित्व’ को बचाने के मुद्दे को इस दिन से इस कदर जोड़ दिया है कि लोग वाकई ‘हिन्दी दिवस के महत्व’ को भूल गए हैं.

14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से यह निर्णय लिया कि हिन्दी (देवनागरी लिपि में लिखी हुई) ही भारत की राजभाषा होगी और इस ख़ुशी को प्रति वर्ष मनाने के लिए ‘हिन्दी दिवस’ मनाया जाता है.” यह बात आज बहुत कम लोगों को याद है और अगर इस ही तरह हिन्दी के अस्तित्व पर शक करते रहेंगे तो शायद आने वाली पीढ़ियों को यह दिन वास्तव में ‘हिन्दी के अस्तित्व’ को बचाने के लिए ही मनाना पड़ेगा.

वर्तमान में वैश्वीकरण के चलते अंग्रेजी का उपयोग अधिक बढ़ गया है और सभी जगहों पर औपचारिक रूप से अंग्रेजी ही प्रचलन में है परन्तु इसका मतलब यह बिलकुल नहीं है कि हिन्दी अपना अस्तित्व खो रही है. ऐसा भी कहा जा रहा है कि युवा पीढ़ी में अंग्रेजी का प्रयोग ज़्यादा किया जाता है और वे हिन्दी में वार्तालाप करना तुच्छ समझते हैं लेकिन क्या SMS पर OMG, Please, Sorry, Thank you लिखने से हम उनकी भाषा को अंग्रेजी मान सकते हैं? उम्र जो भी हो, क्या किसी भी व्यक्ति को आपने भगवान सेमात्रभाषा को छोड़कर किसी और भाषा में बात करते देखा है…? नहीं ना…तो फिर हिन्दी कभी लुप्त नहीं हो सकती और उसके अस्तित्व पर सवाल उठाना यानी उसका अपमान करने के बराबर है.

मैं यह मानता हूँ कि इंसान स्वयं से, भगवान से और अपनों से हमेशा अपनी भाषा में ही बात करता है और हिन्दी का अस्तित्व न आज खतरे में है न कल होगा. आज भी दूर देश में अगर हमें कोई हिन्दीभाषी मिल जाए तो अनजान होने के बाद भी अपना सा लगता है और उससे एक अलग ही अपनत्व का रिश्ता बन जाता है. हिन्दी भाषा वो डोर है जो हम हिन्दुस्तानियों को अनेकता में भी बांधे रखने का काम कर रही है.

मैं आज के दिन सिर्फ इनता कहना चाहूँगा कि ‘हिन्दी के अस्तित्व’ को बचाने के लिए नहीं बल्कि हिन्दी के अस्तित्व को मनाने के लिए ‘हिन्दी दिवस’ मनाइए और हम अगर वाकई हिन्दी को सम्मान देना चाहते हैं तो सभी अपने घर में सिर्फ हिन्दी का ही प्रयोग करें!

…kyoonki ve hee to mere sanskaar purush the !!

…………..क्यूंकि वे ही तो मेरे संस्कार पुरुष थे !!

सुदर्शन जी का अचानक हमारे बीच से जाना ठीक वैसा ही है जैसे बहुत बड़ी भयानक भीड़ में बच्चे का हाथ थामे पिता का गुम हो जाना होता है. हमारे राष्ट्र, हमारे धर्म, हमारी विरासत और हमारे विज्ञान से जितना प्रेम उनको था उतना ही प्रेम वे युवा पीढ़ी को करते थे. वे चाहते थे कि युवा पीढ़ी भी वैज्ञानिक विरासत पर उतना ही गर्व करे. मध्यप्रदेश शासन में विज्ञान व तकनीकी मंत्री का दायित्व जब मुझे मिला तो मैंने पाया कि वे निरंतर व्यक्तिगत रूप से मुझ में और विभाग में रूचि रख रहे हैं. हमारे आस-पास बिखरा प्लास्टिक और पॉलिथीन जमीन की उर्वरता तो समाप्त कर ही रहा है, वह पर्यावरण को भी असीम क्षति पहुंचा रहा है, इसलिए इसका सकारात्मक उपयोग होना चाहिए, यह सोचकर सुदर्शन जी ने प्लास्टिक से पेट्रोल बनाने की एक ‘प्रोजेक्ट रिपोर्ट’ बनवाई थी. इस रिपोर्ट के किर्यान्वयन पर वे सरकारों से सक्रिय व सतत संपर्क बनाए हुए थे. देश, समाज व व्यक्ति की आर्थिक आत्मनिर्भरता की चिंता वे प्रति क्षण  करते थे. कम से कम भूमि में अधिक, लाभदायी और स्वास्थ्यवर्धक खाद उत्पादन पर काम कर रहे कृषि वैज्ञानिक सुदर्शन जी के विशेष स्नेह पात्र होते थे.

विज्ञान और वैज्ञानिक विरासत को आत्मनिर्भरता का साधन बनाने पर सुदर्शन जी ने अनुपम काम किया है. उनके व्यक्तित्व का यह पक्ष कई लोगों को बाद में पता चला, किन्तु भाषा , दर्शन , इतिहास, राजनीति और धर्म के प्रकांड विद्वान के रूप में हमने उन्हें अपने बचपन से देखा है. साठ के दशक में मध्यभारत में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रान्त प्रचारक रहे थे. अपने नाम के अनुरूप ही ‘सुदर्शन’ और पठन पाठन में पारंगत सुदर्शन जी अत्यंत ही प्रभावी और लोकप्रिय प्रचारक थे. विश्वविद्यालयों के विद्वान प्रध्यापक और तेजस्वी छात्र उन्ही दिनों संघ से जुड़े थे. हमारी पीढ़ी ने सम्पूर्ण “इंसायक्लोपीडिया ब्रिटानिका” सुदर्शन जी के पास ही देखी थी. वे सन्दर्भ के लिए उस ग्रन्थमाला का नियमित अध्ययन करते थे. अपनी अनुपम बौद्धिकता, पढने, लिखने और अभिव्यक्त करने की अद्भुत क्षमता को उन्होंने मा. सुरेश जी  सोनी सहित हजारों-हज़ार स्वयं सेवकों में अंतरित किया है.

विराट हिन्दू समाज के विराट स्वरुप के लिए सुदर्शन जी ने आजीवन अथक प्रयास किए थे. सत्तर व अस्सी के दशकों में कई कारणों से सिख समाज में अलगाव का भाव आया था. स्व. इंदिरा जी की हत्या के बाद हुए दंगों ने इस अलगाव की खाई को और चौड़ा किया था. तब सुदर्शन जी ने सिख समाज में जाकर जो बातें की व ऐतिहासिक तथ्यों के साथ उन्हें विराट हिन्दू समाज का अभिन्न अंग बताया, उन्हें सुनकर सिख विद्वान भी कह पड़े कि सुदर्शन जी के पास हमारे धर्म का ज्ञान हमसे ज्यादा है. पिछले वर्ष उन्होंने इसी क्रम में एक आयोजन छत्तीसगढ़ में किया था. विभिन्न पंथ व पूजा पद्दति को मानने वाले हिन्दू समाज के ही सभी अंगों को एक साथ बैठाकर यह विमर्श किया था किभारत में रहने वाला, भारतमाता को प्रणाम करने वाला और यहाँ जीवन यापन करने वाला हर व्यक्ति ‘हिन्दू’ है.

इंदौर, मध्यप्रांत व मध्यप्रदेश सुदर्शन के असीम स्नेह के पात्र सदैव रहे थे. उनकी प्राथमिक, माध्यमिक व उच्चशिक्षा यहीं हुई थी. यहीं पहले बुंदेलखंड और बाद में मध्यप्रान्त मालवा में वे संघ के प्रचारक रहे थे. उनके एक शिक्षक डॉ. एस. एम. दासगुप्ता अपने जीवन भर उन्हें स्मरण कर गर्व से कहते थे कि मैं सुदर्शन का शिक्षक रहा व वे मेरे श्रेष्ठ विद्यार्थी थे. सुदर्शन जी के नीजी मित्र व सहपाठी शिरू भैया (मा. श्री गोपाल जी व्यास) की ही पुस्तक ‘सत्यमेव जयते’ के विमोचन हेतु वे रायपुर गए थे. वहां प्रातः शाखा में जाकर ध्वज प्रणाम व प्रार्थना के बाद प्राण त्याग कर सुदर्शन जी ने साबित किया कि वे भारत माता के योग्य पुत्र थे. उनकी अंतिम इच्छा भी यही थी कि प्राण त्याग के समय वे भारत माता कि प्रार्थना करते रहें.

मैं, प.पू. सुदर्शन जी के लाखों लाख प्रिय व अनुयायी स्वयं सेवकों में से एक हूँ. उनसे जब भी पिछले कुछ वर्षों में मिला, तो वे साथ खड़े अन्य लोगों से मेरा परिचय कराते हुए इंदौर के पित्रपर्वत का स्मरण बिना भूले करते थे. उस समय मुझे अपना जीवन धन्य लगने लगता था, क्यूंकि वे ही तो मेरे संस्कार पुरुष थे..

Kailash Vijayvargiya wishing Narendra Modi on his Birthday

Kailash Vijayvargiya wishing Narendra Modi on his Birthday

दृढ़ व्यक्तित्व के धनी,

अपार ऊर्जा के स्त्रोत,

नव विचारधारा के संवर्धक,

प्रभावशाली कार्यसाधक,

नरेन्द्र मोदी जी को मेरी ओर से

जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ!

‘Desh kee sehat’ ab aapake haath mein hai !!

‘देश की सेहत’ अब आपके हाथ में है !!

कैंसर, डायबीटीज, एड्स, इन्फर्टिलिटी, मालन्यूट्रीशन, ओबेसिटी, हार्ट अटैक जैसी कई बीमारियाँ देश में बहुत तेज़ी से फैलती जा रही हैं. पिछले एक दशक में उनके आंकड़े चौका देने वाले स्तर तक पहुँच गए हैं. जिस तरह आम नागरिकों की ज़िन्दगी पर हर तरफ से दबाव पड़ रहा है उसका असर सेहत पर पड़ना तो स्वाभाविक है. देश वाकई भ्रष्टाचार और आर्थिक अव्यवस्था की बिमारी से बुरी तरह पीड़ित है, जो कि प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से जन-जन की सेहत के लिए हानिकारक होता जा रहा है.

हर स्तर पर आगे बढ़ने की होड लगी है और डार्विन की थियोरी ‘सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट’ (Survival of the Fittest) जैसे हर पल सिद्ध होती दिखाई दे रही है, बस फर्क इतना है कि पहले चुनौती प्रकृति की दी हुई थी और अब इंसानों की. मानव द्वारा किए गए विकासों ने ज़िंदगी को आसान बनाने के साथ-साथ जटिल भी बना दिया है और अब लालसा एक महामारी की तरह फ़ैल गई है. अब इतने तनाव में शरीर स्वस्थ कैसे रह सकता है…?

जीवनशैली के साथ ही खान-पान और हवा-पानी भी पहले की तरह बिलकुल नहीं रहे, उन्हें भी इंसान ने प्रदूषित कर दिया है. आज किसान द्वारा फसल की ज्यादा पैदावार व कीमत पाने और उन्हें अच्छा दिखाने के लिए किए गए प्रयास यानी पेस्टीसाइड्स और फर्टिलाइज़र्स का अत्यधिक मात्रा में उपयोग हम सभी को स्वास्थ्य से दूर और बीमारियों के करीब ले जा रहा है. और इतना ही नहीं, इन सभी के फल स्वरूप इंसान के शरीर में विभिन्न प्रकार के नए विकार भी देखने को मिल रहे हैं. ऐसे में बीमारियों से बचने के लिए सिर्फ चिकित्सा का ही सहारा है.

वैसे तो कहा जाता है कि ‘प्रीवेंशन इज़ बेटर देन क्योर’ (Prevention is better than cure) परन्तु इन हालातों से बचना तो असंभव सा लगता है इसलिए चिकित्सा ही एक मात्र उपाय बचा है जिस पर निर्भर हुआ जा सकता है. आज भारतीय चिकित्सा सेवाओं में तकनीकी क्रान्ति देखी जा सकती है और इसका श्रेय सभी वैज्ञानिकों और चिकित्सकों को जाता है. आज डॉक्टर्स डे के अवसर पर मैं आप सभी डॉक्टर्स से यह अनुरोध करना चाहूँगा कि अब सामाज में आए इन विपरीत परिवर्तनों को परास्त कर आप ही एक नवीन स्वस्थ समाज का निर्माण करें. लोगों में जागरूकता फैलाकर उन्हें तनाव से लड़ने के कुशल तरीके सिखाएं और संतुष्ट रहने की प्रवृत्ति को जन-जन की आदत बनाएँ.

डॉक्टर्स डे की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं !!