संवत्सर पर दीप जलाएं

कैलाश विजयवर्गीय
नव संवत्सर 2076 पर शुभकामनाएं। चैत्र नवरात्र के साथ ही गुड़ी पड़वा, होला मोहल्ला, युगादि, विशु, वैशाखी, कश्मीरी नवरेह, उगाडी, चेटीचंड और चित्रैय तिरुविजा के अवसर आप सबको बधाई और शुभकामनाएं। भारतीय नव वर्ष के आगमन के साथ ही हम सब नए संकल्प के साथ विकास, एकता और अखंडता का मंत्र पूरे राष्ट्र में गुंजाएं। नव संवत केवल नव वर्ष की शुरुआत नहीं है। विक्रम संवत 2076 हमें स्मरण कराता है भारत की महान समृद्ध परम्पराएं। विक्रम संवत के प्रारम्भ से जुड़ी हैं शौर्य, शक्ति, भक्ति, त्याग की प्राचीन गौरव गाथाएं। संवत्सर हमें याद दिलाता है कि भारत की प्राचीन वैज्ञानिक काल गणनाओं का इतिहास। विक्रम संवत हमें हमारी प्राचीन संस्कृति से जोड़ने का पर्व है। यह दिन आने वाले उत्सवों की शुरुआत का है। आइयें विक्रम संवत का धूमधाम से स्वागत करें। मां दुर्गा की आराधना में तो हम दीपक प्रज्वलित करते ही हैं। साथ ही रात्रि में घरों पर दीप जलाकर अज्ञान के अंधकार को भगाएं और ज्ञान के प्रकाश का स्वागत करें, वंदन करें, अभिनंदन करें। इस पवित्र अवसर मां दुर्गा की आराधना कर राष्ट्र के शत्रुओं की विनाश की कामना और अधर्म पर धर्म की जय का शंखनाद करें।
भारतीय हिन्‍दू कैलेंडर विक्रम संवत एक अति प्राचीन संवत है। इस पंचांग में हर प्रकार के ग्रहों की गणना की गई है। विक्रम संवत की ग्रह गणनाओं के आधार पर जन्म के बाद मुंडन, यज्ञोपवीत, विद्याआरम्भ, विवाह आदि मांगलिक कर्मों के साथ ही पुरखों की आत्मा की शांति के लिए होने वाले दान-पुण्य किए जाते हैं। विक्रम संवत का प्रारम्भ उज्जयिनी के महान सम्राट विक्रमादित्य ने किया था। प्राचीन ग्रंथों में बताया गया है कि विक्रमादित्य नव संवत के दिन ही राजसिंहासन पर विराजमान हुए थे। हमारे यहां और भी कलैंडर प्रचलन में है पर विक्रम संवत सर्वमान्य संवत हैं। विक्रम संवत सूर्य-चन्द्र की गति पर आधारित है। संवत के अनुसार ग्रहों की गणनाओं के आधार पर मौसम ही नही तमाम भविष्यवाणियां सटीक सिद्ध हुई हैं।
विक्रम संवत के आधार पर कल्प, मनवंतर, युग, संवत्सर आदि कालगणना की जाती है। पुराणों के अनुसार भारत का सबसे प्राचीन संवत कल्पाब्ध था। सृष्टि, सप्तर्षि, ब्रह्म-संवत, वामन-संवत और परशुराम-संवत, श्रीराम-संवत, युधिष्ठिर संवत और कलि संवत का उल्लेख युगों के अनुसार प्रचलन में थे। सतयुग का प्रारम्भ नव संवत से ही हुआ था। इस बारे में अथर्ववेद तथा शतपथ ब्राह्मण में बताया गया है। योगीराज भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की तिथि से कलियुग संवत का प्रारम्भ हुआ था। पुराणों में बताया गया है कि नव संवत को ही भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार लिया था। भगवान राम का राज्याभिषेक भी नव संवत के दिन हुआ था।
पुराणों के अनुसार नव संवत्सर पर सूर्योदय से ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना प्रारंभ की। भक्ति और शक्ति के नौ दिवसीय पर्व नवरात्र का प्रारम्भ का प्रथम दिन होता है नव संवत यानी चैत्र शुक्ल की प्रतिपदा। सिखो के द्वितीय गुरू श्री अंगद देव जी का जन्म दिवस है। स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने नव संवत पर ही आर्य समाज की स्थापना की और कृणवंतो विश्वमआर्यम का विश्व को संदेश दिया | सिंध प्रान्त के प्रसिद्ध समाज रक्षक वरूणावतार भगवान झूलेलाल जन्मोत्सव संवत्सर के अगले दिन मनाया जाता है। चेटीचंट का त्योहार सिंध में नव संवत के दूसरे दिन मनाया जाता है। विक्रमादित्य की भांति शालिवाहन ने हूणों को परास्त कर दक्षिण भारत में श्रेष्ठतम राज्य स्थापित करने हेतु यही दिन चुना। शक संवत की स्थापना की । महाराजा युधिष्ठिर का राज्यभिषेक भी इसी दिन हुआ। महर्षि गौतम की जयंती का दिन भी है संवत्सर।
भारत में सनातन संस्कृति के लिए राष्ट्र प्रेम का भाव जगाने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक माननीय केशवराव बलिराम हेडगेवार का जन्म भी इस पावन दिन हुआ था। नव संवत हमारे देश की कृषि से जुडें पर्वों के प्रारम्भ का दिन है। फसल पकने के साथ किसानों को अपने परिश्रम का फल मिलता है। महाराष्ट्र गुडी पडवा पर्व, पंजाब में होला मोहल्ला, दक्षिण उगाडी पर्व आदि सभी कृषकों के उल्लास और मस्ती के पर्व हैं। यह प्रकृति के पूजन के पर्व भी है। संवत्सर पर देवी-देवताओं, यक्ष-राक्षस, गन्धर्वों, ऋषि-मुनियों, मनुष्यों, नदियों, पर्वतों, पशु-पक्षियों आदि के पूजन का विधान बताया गया है। आराधना के माध्यम से हम सुख, समृद्धि, शांति, आरोग्य और सामर्थ्य की कामना करते हैं। नवरात्र में नौ दुर्गा के नवरूपों की उपासना से हमें से रोगों से मुक्ति मिलती हैं। आइये नव संवत्सर पर शक्तिशाली भारत के निर्माण का संकल्प लेकर हम उत्साह के साथ पर्व मनाएं।